
कैसे सहे इस दर्द को..
हर घाव का निशाँ अभी ताजा है..
घाव शारीर पे हो तो अलग है बात..
जब दिल पे हो जाये, तो क्या दवा है?
किसीको बतलाये भी तो क्या
ये दर्द सुननेवाला कोई नहीं...
गैरों से क्या बतलाये..
यहाँ तो अपना भी कोई नहीं!
कैसे सहे इस दर्द को..
मेरे आसूं भी आज गवाह है..
चोट दिल पे लगी है दोस्तों..
और, इस दर्द की कोई दवा नहीं..!
महेश.
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