उस शहर कि हर गली गली से वाकीत है हम..
जिस गली कि आरजू थी, वहा किसी और का बसेरा पाया...
-------------------------------------------------
उस शेहर कि गली गली से वाकीत है हम...
बस जिसकी आस थी वो गली अब हमारी नही रही!
-------------------------------------------------
इक जमाने मे बसाया था
अपना आशीयां हमने तेरे शहर मे..
गजब लोग है तेरे शहर के...
ऐ सनम..
अब पुछते है, वो जला हुआ मकान किसका है?
-------------------------------------------------
हमने तो सोचा कि बस वोही बेवफा है..
जिसने हमे गम-ए-महोब्बत मे अकेला छोडा है..
दोस्तों..
तन्हा रातों कि बेवफाई का सर्-ए-अंजाम
हमने कभी देखा नही था..
------------------------------------------------
जो रातें कभी गुजरती थी सपनो मे..
ऐ सनम..
आज फुर्जो मे बिखर गयी है!
------------------------------------------------
जालीम जमाने कि क्या बात करे यारो..
दिलवालो का घर जलाके...
(आज फक्र-ए-शौक से)
उनकी मोहोब्बतो कि कहानिया लोग सुनाते है!
------------------------------------------------
No comments:
Post a Comment