तुम में हीरे की सिफ़त है तो अंधेरे में मिलो
.....ए सितमगर.....
धुप में तो कांच के टुकरे भी चमक जाते है!
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मुझको पढ़ना तो जरा ध्यान से पढ़ना
...ऐ दोस्तों....
अपनी ही ज़ात में बिखरी हुयी एक किताब हूँ मै!
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तलाश कर मेरी मोहब्बत को अपने दिल में
-------ऐ सितमगर -----
दर्द हो तो समझ लेना, मोहोब्बत अब भी बाकी है!
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गम-ए-महफ़िल में बैठे तो समझ में आया..
दुनिया में सब लोग इसी बीमारी के शिकार है!
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पत्तों की तरह बिखरे थे हम..
किसीने समेटा भी तो सिर्फ जलाने के लिए!
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हम पुकारते रहे जाने वालेको..
और उन्होंने इकबार मुड़कर भी न देखा..
जब आयी बात जमाने की..
लोगों ने पूछा...तुमने उसे क्यों नहीं रोका?
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