हम खामोश रहे, कुछ कहा नहीं..
आंखे बोलती रही, जुबा पे बात कभी आई नहीं!
उन्होंने कभी देखा नहीं इन आँखों में
इस दिल के जज्बात उनको कभी समझे नहीं!
कशिश तो थी उनके आँखों में बी,
मगर उनसे कभी बया न हुयी!
आलम ए ख़ामोशी में कुछ ऐसे दुबे रहे वो..
मोहब्बत ख़ामोशी पे कुर्बान हो गयी!
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आँखों से हमने भी बया की..
कहानी-ए-मोहब्बत कई बार..
खामोश रहे वो सुनके
न किया कभी ऐतबार!
पत्थर दिल को भी
आ गया हम पे तरस...
लेकिन जब हम हमेशा के लिए..
खामोश हो गए!
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कई बार किया हमने
इकरार-ए-मोहब्बत अपनी आँखों से..
पत्थर दिल को रास न आया...
जब हुवा उनको एहसास
हमारी दिल-ए-कश्मकश का...
हमारा दिल खामोश पाया!
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सुनहरी महेफिल जमाके
साकी कही चला गया
हम दुबे रहे आगोश में
अंत में खुद को अकेला ही पाया!
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उनको जागते देखा है हमने
गुजरे हुयें कुछ अरसोसे...
उसको तो कुछ पता भी नहीं...
जगता रहा इक तारा उअसके लिए..बरसोंसे!
अल्फाज ए माही.
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