फिर हम आजाद...तुम आजाद!
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कत्ल तो सर्-ए-आम हुआ हमारा...
बस रूह को जिस्म से आजादी नं मिली!
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बस उसे मेहसूस करनेवाला कोई रहा नही!
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मेहसूस तो अब भी करते हम उसके दर्द को...
बस उसको इस बात का एहसास रहा नही!
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दुरिया ही दिलाती है एहसास इस दर्द का...
बस तभी वक्त साथ छोड देता है!!
बढाते है हम भी अपना हाथ...
जब उनका दिल तुट जाता है!
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