Mann Maze

Mann Maze

अल्फाज-ए-माही..

आज हवाए कुछ बेरुखिसी है...
सुबह से उनका कोई पैगाम न आया!
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आँखों से लाख बाते करते है वो हमसे...
फिर भी
दो बातें सुनने को जी तरस जाता है!

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उन्होंने अपनी जुल्फे लेहरायी शायद...
बेमौसम आसमां में बादल जो छा गए है!

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किये उन्होंने लाखों इशारे अपनी निगाहों से...
नाचिझ ठहरा अनपढ़ गवार, समझने में कई ज़माने लगे!

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सुबह से उनसे आंखे न मिली..
लगता है ज़माने बीत गए उनसे आंख-मचौली खेल के!

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जिनको देखने के लिए तरस गयी थी आंखे...
अब सपनो में उनको देख के दिल को सुकून आया!

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उनकी खुबसुरती तो हमारी आंखो मी बसी है!
फिरभी
न जाने वो आईने में क्या ढूंडते रहते है!

     

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